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‘कूल टीचर’ बनने के खतरे

‘कूल टीचर’ बनने के खतरे

आज एक खास तरह के शिक्षक हैं, जिन्हें माता-पिता और छात्र सराहते हैं। वह ट्रेंडिंग ऑडियो के जरिए क्वाड्रेटिक इक्वेशन समझाते हैं। वह रात 11 बजे इंस्टाग्राम पर लाइव आकर बोर्ड परीक्षाओं पर “रियल टॉक” करते हैं। वे छात्रों के डीएम (डायरेक्ट मैसेज) का जवाब देते हैं। स्टाफरूम के वीडियो पोस्ट करते हैं। उसे कुछ इस तरह कैप्शन देते हैं- “स्कूल बोरिंग नहीं होना चाहिए।” इरादा अच्छा होता है, लेकिन इसके नतीजे गंभीर हैं। 2026 में “कूल टीचर” होने का मतलब तेजी से एक कंटेंट क्रिएटर बनना हो गया है। शिक्षक से इन्फ्लुएंसर बनने का यह बदलाव धीरे-धीरे बच्चों के जीवन की एक अहम सीमा को खत्म कर रहा है। यह सीमा है वयस्क और बच्चे के बीच की दूरी।

शिक्षक-छात्र संबंधों के लिए बने कानूनी नियम यूं ही नहीं बनाए गए हैं। 2012 का पॉक्सो एक्ट (POCSO) शिक्षकों पर कुछ खास जिम्मेदारियां डालता है। ‘लोको पैरेंटिस’ का सिद्धांत उन्हें देखभाल का कर्तव्य देता है। 2015 का जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बच्चों की देखरेख करने वालों पर सामान्य जिम्मेदारी डालता है। ये सारी बातें कुछ मामलों में शिक्षकों पर भी लागू हो सकती है, लेकिन यह उन्हें अलग से लक्षित नहीं करता। यह जिम्मेदारी डिजिटल दुनिया में खत्म नहीं होती। जब कोई शिक्षक 15 साल के छात्र को इंस्टाग्राम पर फॉलो करता है, आधी रात को मीम भेजता है या किसी छात्र की निजी रील पर कमेंट करता है, तो वह सीमा जो स्कूल में बनी रहती है, ऑनलाइन टूटने लगती है।

ग्रूमिंग अक्सर सीधे नुकसान से शुरू नहीं होती। यह पहुंच, भरोसे और दूरी के कम होने का फायदा उठाती है। कोई शिक्षक बिना गलत इरादे के भी अगर छात्र के डीएम में जाता है, तो भी ऐसी स्थिति बन सकती है। इसलिए सीमा बनाए रखना जरूरी है, चाहे मंशा कुछ भी हो। ऐसे अनौपचारिक चैट हमेशा निजी नहीं रहते। उनके स्क्रीनशॉट आसानी से पॉक्सो मामले में सबूत बन सकते हैं।

जब पढ़ाना कंटेंट बन जाता है, तो वह कंटेंट के नियमों पर चलने लगता है

एक और गहरी समस्या है: जब पढ़ाना कंटेंट बन जाता है, तो वह कंटेंट के नियमों पर चलने लगता है। ये नियम- जो सोशल मीडिया एल्गोरिदम तय करते हैं। गुस्सा, सरलता और निजी जुड़ाव को बढ़ावा देते हैं। कक्षा का मतलब बदलने लगता है। शिक्षक अब ज्ञान और निष्पक्ष अधिकार का प्रतीक नहीं रह जाता, बल्कि एक इन्फ्लुएंसर बन जाता है।
जिसकी पहचान उसकी लोकप्रियता से तय होती है। ऐसे में अनुशासन लागू करना, कम नंबर देना या सख्त फीडबैक देना उसकी छवि के लिए खतरा बन जाता है। हालिया शोध (Ljungblad, 2022; Roy et al., 2024) असली रिश्ते पर आधारित पढ़ाई और दिखावे वाली पढ़ाई के बीच फर्क बताता है। यूट्यूब लाइव पर भावनात्मक सत्र चलाने वाला शिक्षक संबंध नहीं बना रहा, बल्कि छात्रों की संवेदनशीलता को उपयोग में ला रहा है।

भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 कहता है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे अपने डेटा के इस्तेमाल की सहमति नहीं दे सकते। फिर भी कक्षा के वीडियो, जिनमें बच्चों की आवाज, स्थिति और प्रतिक्रिया साफ दिखती है, रोज पोस्ट किए जाते हैं। चेहरा छिपाने के बावजूद, किसी बच्चे की हंसी, गलती या शर्मिंदगी एल्गोरिदम के लिए सामग्री बन जाती है। संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार समझौते में भी बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी को अहम माना गया है। कानून धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है, लेकिन सही और गलत के बीच की दूरी पहले ही बढ़ चुकी है। “कूल” दिखने का फायदा भी सभी शिक्षकों को बराबर नहीं मिलता। इसमें लिंग, जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव भी दिखता है। स्कूल अब शिक्षकों से संस्थान की ऑनलाइन पहचान बनाने की उम्मीद भी रखने लगे हैं।

नियम और समझ जरूरी

नियम साफ हैं, लेकिन उनका पालन उतना नहीं हो रहा। सीबीएसई के नियम कहते हैं कि शिक्षक को पेशेवर गरिमा बनाए रखनी चाहिए। बिना सही अनुमति के छात्रों का डेटा इकट्ठा करना या साझा करना कानूनी परेशानी ला सकता है। तमिलनाडु में भी शिक्षक-छात्र डिजिटल बातचीत के लिए दिशा-निर्देश बनाए गए हैं। पॉक्सो एक्ट बच्चों के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार को अपराध मानता है। इन सभी नियमों का मतलब साफ है। ऑनलाइन हो या ऑफलाइन, शिक्षक-छात्र संबंध पेशेवर और सुरक्षित होने चाहिए।
यह कहना नहीं है कि हमें पुराने सख्त तरीकों पर लौटना चाहिए। लेकिन सख्ती का जवाब सीमाओं को खत्म करना नहीं है। स्कूलों को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। छात्रों को निजी तौर पर फॉलो न करना, डीएम न करना, देर रात लाइव न आना और निजी अकाउंट पर कक्षा के वीडियो पोस्ट न करना। शिक्षकों को समझना होगा कि सोशल मीडिया का एल्गोरिदम शिक्षा के लिए तटस्थ नहीं है। साथ ही, स्कूलों को शिक्षकों को भी सुरक्षा देनी चाहिए, क्योंकि इस रिश्ते में जोखिम दोनों तरफ है। शिक्षक का काम पसंद किया जाना नहीं, बल्कि भरोसा बनाना है। अगली बार कोई रील बनाने से पहले एक सवाल जरूर पूछें: यह किसके लिए है। आपके सामने बैठे बच्चे के लिए या स्क्रीन पर दिख रहे नंबर के लिए? इन दोनों के जवाब अलग होते हैं और इन्हीं के बीच से नुकसान शुरू होता है।

नोट : इस आलेख को THE HINDU अखबार ने प्रकाशित किया है। आलेख को Nabeela Siddiqui, Assistant Professor, Vinayaka Mission’s Law School, VMRF-DU, Chennai ने लिखा है। अंग्रेजी के इस मूल आलेख को educationjharkhand.com ने हिंदी में प्रकाशित किया है।

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