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भारतीयों का कम फीस में विदेश से MBBS करने का बढ़ता ट्रेंड, लेकिन FMGE पास करना बड़ी चुनौती

भारतीयों का कम फीस में विदेश से MBBS करने का बढ़ता ट्रेंड, लेकिन FMGE पास करना बड़ी चुनौती

भारत में सरकारी मेडिकल सीटों की सीमित संख्या के कारण हर साल बड़ी संख्या में छात्र विदेश का रुख कर रहे हैं। खासकर वे छात्र जिनकी नीट रैंक 1 लाख से ऊपर होती है और जिन्हें सरकारी कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाता, उनके लिए विदेश में एमबीबीएस एक व्यवहारिक विकल्प बनकर उभरा है। भारत के निजी मेडिकल कॉलेजों में जहां सालाना फीस 20 से 25 लाख रुपए तक पहुंच जाती है, वहीं उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे देशों में पूरे एमबीबीएस कोर्स का खर्च 18 से 25 लाख रुपए के बीच सिमट जाता है। रूस, कजाकिस्तान और अन्य देशों में यह खर्च 25 से 35 लाख रुपए तक रहता है। कम फीस, आसान एडमिशन प्रक्रिया और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण ये देश भारतीय छात्रों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। विदेश में एडमिशन के लिए 12वीं में 50 प्रतिशत अंक और नीट पास होना ही पर्याप्त है, जिससे छात्रों को राहत मिलती है।

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प्रैक्टिस करने के लिए FMGE पास करना अनिवार्य

हालांकि, विदेश से एमबीबीएस करने के बाद भारत में प्रैक्टिस करना आसान नहीं होता। इसके लिए फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जाम (FMGE) पास करना अनिवार्य है, जिसका पास प्रतिशत पिछले वर्षों में काफी कम रहा है। आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 सत्र में 23.37 प्रतिशत, जून 2025 में 18.61 प्रतिशत, दिसंबर 2024 में 28.90 प्रतिशत और जून 2024 में 20.90 प्रतिशत छात्र ही इस परीक्षा में सफल हो पाए। यानी चार सत्रों में पास प्रतिशत 18 से 29 प्रतिशत के बीच ही रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ कम फीस देखकर विदेश में कॉलेज चुनना जोखिम भरा हो सकता है। छात्रों को संबंधित यूनिवर्सिटी की गुणवत्ता, फैकल्टी, क्लिनिकल एक्सपोजर और पिछले वर्षों के रिजल्ट का भी गहन मूल्यांकन करना चाहिए। कुछ देशों जैसे उज्बेकिस्तान, जॉर्जिया और बांग्लादेश की चुनिंदा यूनिवर्सिटीज का प्रदर्शन बेहतर जरूर रहा है, लेकिन कुल मिलाकर सफलता दर अभी भी चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में छात्रों और अभिभावकों को सोच-समझकर निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है।

विदेश जाने से पहले जानें ये पांच जरूर नियम

4.5 साल की पढ़ाई जरूरी: थ्योरी कोर्स कम से कम 54 महीने का होना चाहिए। 4 साल के कोर्स मान्य नहीं हैं।

जहां पढ़ाई, वहीं इंटर्नशिप : 12 महीने की क्लिनिकल इंटर्नशिप उसी संस्थान से करनी होगी। छात्रों को कोर्स के बीच में कॉलेज बदलने की अनुमति नहीं होती है।

अंग्रेजी में पढ़ाई: पूरा मेडिकल कोर्स अंग्रेजी में होना चाहिए। दूसरी भाषा में पढ़ाई करने पर भारत में प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे।

नीट यूजी जरूरी: जिस साल विदेश में दाखिला लें, उसी साल नीट यूजी क्वालीफाई होना अनिवार्य है।

लाइसेंस के लिए NEXT: भारत से MBBS करने वालों को प्रैक्टिस के लिए ये एग्जाम पास करना होगा। इसे भविष्य में विदेश से MBBS वालों के लिए भी लागू करेंगे।

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छात्रों के फेल होने के प्रमुख कारण

सिलेबस और भाषाः कई विदेशी यूनिवर्सिटीज का सिलेबस भारत से अलग है। कई देशों में स्थानीय भाषा भी सीखनी पड़ती है।

प्रैक्टिकल अनुभव की कमी: कम मरीजों के कारण क्लिनिकल ट्रेनिंग पर्याप्त नहीं मिल पाती।

तैयारी में लापरवाही: कई छात्र डिग्री मिलते ही खुद को डॉक्टर मान लेते हैं। वे शुरू से FMGE की तैयारी नहीं करते।

सफलता के लिए ये हैं 4 टिप्स

  • सिर्फ फीस नहीं, यूनिवर्सिटी का FMGE रिजल्ट भी देखें।
  • दाखिले से पहले सुनिश्चित करें कि विवि NMC के नियमों का पालन करता हो।
  • ऐसे अस्पताल वाला कॉलेज चुनें, जहां मरीज ज्यादा आते हों। अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ रखें।
  • पहले साल से ही भारतीय किताबों और परीक्षा पैटर्न से तैयारी शुरू करें।

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