राज्य के प्राइवेट शैक्षणिक संस्थान नहीं वसूल सकेंगे मनमानी फीस, कॉलेजों की फीस पर होगा सरकार का नियंत्रण
झारखंड के निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में अब मनमाने शुल्क वसूलने की प्रथा पर रोक लगा दी गई है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने झारखंड व्यावसायिक शिक्षा संस्थान (शुल्क विनियमन) विधेयक 2025 को अपनी स्वीकृति दे दी है। राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून बन गया है। इसके तहत राज्य सरकार अब प्रत्येक शिक्षण सत्र के लिए निजी संस्थानों में चलने वाले व्यावसायिक कोर्सों की फीस संरचना तय करेगी। इसका सीधा असर इंजीनियरिंग, मेडिकल, नर्सिंग, लॉ, प्रबंधन और होटल प्रबंधन जैसे कोर्सों की फीस पर पड़ेगा।
फीस निर्धारण के लिए बनेगी प्राधिकरण, रिटायर्ड जज होंगे अध्यक्ष
विधेयक के तहत राज्य सरकार एक “झारखंड व्यावसायिक शिक्षा शुल्क निर्धारण प्राधिकरण” का गठन करेगी, जो प्रत्येक संस्थान की फीस तय करने और उसकी समीक्षा करने का काम करेगी। इस प्राधिकरण के अध्यक्ष एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे। इसके साथ ही उच्च तकनीकी शिक्षा विभाग और वित्त विभाग के सचिव इसके नामांकित सदस्य होंगे, जबकि एक शिक्षा विशेषज्ञ को भी सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा।
इसके अलावा अध्यक्ष द्वारा एक प्रतिष्ठित चार्टर्ड एकाउंटेंट और संबंधित विषय—मेडिकल, डेंटल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन या कृषि—के एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् को सदस्य बनाया जाएगा। संबंधित विभाग के सचिव (स्वास्थ्य, तकनीकी या कृषि) भी इसमें शामिल होंगे। समिति की बैठक में कम से कम तीन सदस्य या 50 प्रतिशत सदस्य उपस्थित रहना आवश्यक होगा। चार्टर्ड एकाउंटेंट का कार्यकाल एक वर्ष और अन्य सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा। हालांकि, कोई भी सदस्य पुनः नामांकित नहीं किया जा सकेगा।
इन कोर्सों पर रहेगा कानून का दायरा
यह नया कानून राज्य के सभी निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में चल रहे व्यावसायिक कोर्सों को दायरे में लाता है। इसमें इंजीनियरिंग, मेडिकल (एमबीबीएस, बीडीएस, बीएएमएस, बीएचएमएस, बीयूएमएस), नर्सिंग, फिजियोथेरपी, होटल मैनेजमेंट, एजुकेशन (बीएड, एमएड), लॉ (एलएलबी, एलएलएम), प्रबंधन (बीबीए, एमबीए), एप्लाइड साइंस और तकनीकी कोर्स शामिल हैं।
किसी भी स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के व्यावसायिक कोर्स को इस विधेयक के तहत लाया गया है। इसके मुताबिक, किसी संस्थान को एकेडमिक सत्र में केवल एक बार ही फीस बढ़ाने की अनुमति होगी। साथ ही, किसी विद्यार्थी से एक वर्ष की फीस से अधिक अग्रिम में वसूलना वर्जित रहेगा। इससे छात्रों और अभिभावकों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अब तक मुंहफाड़ फीस और अतिरिक्त कैपिटेशन चार्ज का सामना करना पड़ता था।
नियम तोड़ने पर कड़ी कार्रवाई, मान्यता भी रद्द होगी
विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई निजी शिक्षण संस्थान इन नियमों का उल्लंघन करता पाया गया, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। ऐसे संस्थानों की मान्यता रद्द की जा सकती है और 20 लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकेगा।
सरकार का मानना है कि इस कानून के लागू होने से झारखंड में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता आएगी और छात्रों पर आर्थिक बोझ कम होगा। साथ ही, निजी कॉलेजों की फीस नीति पर नियंत्रण से राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह कानून छात्रों और उनके अभिभावकों के हित में एक ऐतिहासिक पहल साबित हो सकता है।
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