झारखंड के निजी स्कूलों में किताब-कॉपी की बिक्री पर रोक: विभाग का सख्त निर्देश, आदेश नहीं मारने पर मान्यता रद्द करने तक की चेतावनी
झारखंड के स्कूली शिक्षा व साक्षरता विभाग ने राज्य के सभी निजी विद्यालयों को सख्त निर्देश जारी करते हुए स्कूल परिसर में किताब-कॉपी, पाठ्य सामग्री और स्कूल ड्रेस की बिक्री पर रोक लगा दी है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि कोई भी निजी स्कूल अपने परिसर में पाठ्यपुस्तक, कॉपी, पाठ्येतर सामग्री या ड्रेस की बिक्री नहीं कर सकेगा और न ही किसी विशेष पुस्तक विक्रेता की अनुशंसा करेगा। विभाग की ओर से जारी नोटिस में कहा गया है कि आदेश का अक्षरश: पालन सुनिश्चित किया जाए। यदि किसी विद्यालय के खिलाफ आदेश के उल्लंघन की शिकायत मिलती है और जांच में मामला सही पाया जाता है, तो संबंधित स्कूल के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसमें विद्यालय की मान्यता या अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) रद्द करने तक की कार्रवाई शामिल हो सकती है।
आदेश के बाद कई स्कूलों ने बंद किए किताब-कॉपियों के स्टॉल
विभागीय आदेश के बाद वर्ष 2026 में कई निजी विद्यालयों ने अपने परिसर में लगाए जाने वाले किताब-कॉपी के स्टॉल बंद कर दिए हैं। पहले कई स्कूलों में ही अभिभावकों को बच्चों की पाठ्यपुस्तकें, कॉपियां और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध हो जाती थीं। इससे अभिभावकों को एक ही जगह पर सभी चीजें मिल जाती थीं। लेकिन अब आदेश लागू होने के बाद अभिभावकों को किताब-कॉपी खरीदने के लिए बाजार के अलग-अलग पुस्तक भंडारों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। विभाग का कहना है कि यह कदम पारदर्शिता और नियमों के पालन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
अभिभावकों की शिकायत पर लिया गया निर्णय
बताया जाता है कि कुछ अभिभावकों और संगठनों ने सरकार व शिक्षा विभाग से शिकायत की थी कि कई निजी स्कूल परिसर में किताब-कॉपी की बिक्री से भारी मुनाफा कमाते हैं। आरोप था कि स्कूल प्रबंधन विशेष दुकानों के साथ मिलकर स्टॉल लगवाते हैं और किताबों की बिक्री पर कमीशन प्राप्त करते हैं। इन शिकायतों के बाद विभाग ने पूरे मामले की समीक्षा की और नियमों के तहत स्कूल परिसर में व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक लगाने का निर्णय लिया। विभाग का मानना है कि इससे अभिभावकों पर किसी विशेष दुकान से किताबें खरीदने का दबाव नहीं पड़ेगा।
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अधिवक्ता ने आदेश को बताया ‘तुगलकी फरमान’
हालांकि इस निर्णय को लेकर कुछ लोगों ने आपत्ति भी जताई है। अधिवक्ता कुलबिंदर सिंह ने शिक्षा विभाग के आदेश को तुगलकी फरमान बताते हुए कहा कि इससे हजारों अभिभावकों को अनावश्यक परेशानी हो रही है। उनका कहना है कि पहले स्कूल परिसर में ही बच्चों की किताब-कॉपी आसानी से मिल जाती थीं, भले ही कीमत थोड़ी अधिक होती थी। अब अभिभावकों को अलग-अलग दुकानों पर जाकर सामग्री खरीदनी पड़ रही है। उन्होंने सरकार से अभिभावकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बेहतर व्यवस्था करने की मांग की है। वहीं जिला शिक्षा विभाग का कहना है कि राइट टू एजुकेशन के तहत कोई भी स्कूल अपने परिसर का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं कर सकता।
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