दो दस्तावेज के पेंच में फंसा झारखंड में प्रोफेसर प्रमोशन, JPSC ने विश्वविद्यालयों से पूछे सवाल….जानें पूरा मामला
झारखंड के विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर से प्रोफेसर प्रमोशन का मामला एक बार फिर गहरी उलझनों में फंस गया है। झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) द्वारा स्क्रूटनी के दौरान ऐसे सवाल उठाए गए हैं, जिनका जवाब न तो राज्य के किसी विश्वविद्यालय के पास है और न ही पुरानी फाइलें इस पर कोई दस्तावेज उपलब्ध करा पा रही हैं। सबसे बड़ी पेचीदगी यह है कि वर्षों पहले रीडर से एसोसिएट प्रोफेसर बनने की जो प्रक्रिया स्वतः लागू मान ली गई थी, उसका नोटिफिकेशन आज तक किसी के पास नहीं है।
आयोग ने प्रमोशन प्रस्तावों की जांच करते हुए विश्वविद्यालयों से दो मुख्य दस्तावेज मांगे हैं -रीडर से एसोसिएट प्रोफेसर प्रमोशन का नोटिफिकेशन और उस समय आयोग की अनुशंसा (कंकरेंस)। लेकिन राज्य के किसी भी विश्वविद्यालय के पास ये दोनों दस्तावेज मौजूद नहीं हैं। इस स्थिति ने प्रोफेसर प्रमोशन की पूरी प्रक्रिया को रोक दिया है। जेपीएससी सचिव संदीप कुमार ने सभी विश्वविद्यालयों को नया पत्र भेजकर स्पष्ट कहा है कि संबंधित शिक्षकों का प्रमोशन नोटिफिकेशन हर हाल में उपलब्ध कराया जाए।
CAS-2010 के तहत भेजे गए प्रस्तावों में नहीं मिला एसोसिएट प्रोफेसर बनने का आधार
राज्य के विश्वविद्यालयों में करियर एडवांस स्कीम (CAS–Regulation 2010) के तहत दर्जनों शिक्षकों का एसोसिएट प्रोफेसर से प्रोफेसर पद पर प्रमोशन प्रस्ताव आयोग को भेजा गया था। लेकिन जांच में सामने आया कि जिन शिक्षकों का प्रमोशन प्रस्ताव लंबित है, उनमें से किसी का भी एसोसिएट प्रोफेसर बनने का आधिकारिक नोटिफिकेशन मौजूद नहीं है।
यह स्थिति आयोग के लिए बड़ी बाधा बन गई है, क्योंकि प्रमोशन के लिए शिक्षकों की सेवा स्थिति का प्रमाणित होना अनिवार्य है। विश्वविद्यालयों का दावा है कि उनके पास इन पदोन्नतियों से संबंधित कोई भी आधिकारिक दस्तावेज नहीं बचा है, जिससे प्रमोशन की प्रक्रिया पूरी तरह थम गई है। जेपीएससी का कहना है कि जब तक पहले चरण की पदोन्नति के प्रमाण नहीं दिए जाते, प्रोफेसर प्रमोशन को मंजूरी नहीं दी जा सकती।
स्वतः होती थी प्रोन्नति, इसलिए नोटिफिकेशन की जरूरत ही नहीं थी
इस मामले से प्रभावित शिक्षक अपना पक्ष रखते हुए कह रहे हैं कि पुराने नियमों के तहत रीडर बनने के तीन साल बाद शिक्षक स्वतः एसोसिएट प्रोफेसर की श्रेणी में आ जाते थे। इसलिए न तो किसी अलग नोटिफिकेशन की जरूरत थी और न ही जेपीएससी की कंकरेंस की। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया वर्षों से इसी तरह चलती रही है। विश्वविद्यालयों ने भी इसे स्वीकार किया था।
ऐसे में आज अचानक पुराने दस्तावेज मांगने से उनकी पदोन्नति बाधित हो रही है। शिक्षकों का आरोप है कि व्यवस्था की पुरानी खामियों का बोझ अब उन पर डाल दिया गया है और प्रशासनिक अस्पष्टता का नुकसान उन्हें भुगतना पड़ रहा है। फिलहाल यह पूरा मामला ठहराव की स्थिति में है और विश्वविद्यालयों के साथ-साथ आयोग पर भी समाधान खोजने का दबाव बढ़ गया है।
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